Thursday, November 14, 2024

Historical Story

सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की धर्मपत्नी राजमाता हेलेना के वंशज हल्दिया मौर्य लोग हल्दी की तरह गोरे रंग के कारण, हार्डिया, हल्दिया आदि कहे गए है। हेलेना के बेटे का नाम जस्टिन मौर्य था। जो एक विद्वान लेखक बना। जस्टिन मौर्य की संतानें मूल रूप से अधिक गोरी थी। लेकिन सभी मौर्य जाती और उपजातियों में अंतर्विवाह के कारण सब मौर्य घुल मिल गए। जस्टिन बिन्दुसार से बड़े नहीं थे। वह हो ही नहीं सकता था। चन्द्रगुप्त की पहली पत्नी की मृत्यु बिन्दुसार को जन्म देते समय 320 ईसा पूर्व में हो गई थी। चंद्रगुप्त ने 15 साल बाद 305 ईसा पूर्व में हेलेन से शादी की और उनसे जस्टिन का जन्म हुआ। वह बिन्दुसार से कम से कम 20 वर्ष छोटा होना चाहिए। हेलेना एक पतिव्रता और समझदार स्त्री थी। ऐसा कोई दृष्टांत नही मिलता की उसने मौर्य वंश के विरुद्ध किसी प्रकार का कोई राजनैतिक षड्यंत्र किया हो। वो दो महान सभ्यताओं को मिलाने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। उसके समय मे कई यूनानी भारत आये और यहीं पर बस गए। ऐसा ही एक ग्रीक था हेलियोडोरस जो मध्यप्रदेश के विदिशा में बस गया था और उसने एक स्तम्भ का निर्माण करवाया था जिसे उसी के नाम से जाना जाता है। आप कभी विदिशा जाएं तो जरूर देखें।
विश्व की सबसे बड़ी तोप, जो इतिहास में चली एक बार और बना दिया तालाब एक ऐसी तोप जिसके बारे में सुनते ही दुश्मन कांप जाते थे। इस तोप के लिए 1720 में जयपुर स्थित आमेर के पास जयगढ़ किले में विशेष कारखाना स्थापित किया गया। परीक्षण के लिए जब इससे गोला दागा गया, तो वह 30 किलोमीटर दूर 'चाकसू' नामक कस्बे में जाकर गिरा। जहां गिरा वहां एक तालाब बन गया। अब तक उसमें पानी भरा है और लोगों के काम आ रहा है। बस ये बात दूर-दूर तक फैल गई और दुश्मन इस तोप से डरने लगे। किले के नाम के आधार पर ही इस तोप का नामकरण किया गया। आमेर महल के पास स्थित जयगढ़ के किले में यह तोप स्थित है। इसे 'एशिया की सबसे बड़ी तोप' के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपनी रियासत की सुरक्षा और उसके विस्तार के लिए कई कदम उठाए। जयगढ़ का किला और वहां स्थापित जयबाण तोप उनकी इस रणनीति का हिस्सा थी। इस तोप का निर्माण 1720 के आसपास कराया गया था। अरावली की पहाड़ी पर स्थित जयगढ़ किले के डूंगरी दरवाजे पर स्थित जयबाण तोप के बारे में माना जाता है कि यह एशिया की सबसे बड़ी और वजनदार तोप है। इस तोप की नली से लेकर अंतिम छोर की लंबाई 31 फीट 3 इंच है। तोप की नली का व्यास क़रीब 11 इंच है। इसका वजन 50 टन से अधिक होने का अनुमान है। जयबाण तोप का इस्तेमाल आज तक किसी युद्ध में नहीं हुआ और न ही इसे कभी यहां से हिलाया गया। परीक्षण के लिए इस तोप का गोला तैयार करने में 100 किलो गन पाउडर यानी बारूद की जरूरत पड़ी थी। इस तोप को बनाने के लिए जयगढ़ में ही कारखाना बनाया गया। इसकी नाल भी यहीं पर विशेष तौर से बनाए सांचे में ढाली गई थी। लोहे को गलाने के लिए भट्टी भी यहां बनाई गई। इसके प्रमाण जयगढ़ किले में आज भी मौजूद है। इस कारखाने में और भी तोपों का निर्माण हुआ। विजयदशमी के दिन इस तोप की विशेष पूजा की जाती है। ऐसी ओर भी जानकारी पाने के लिए ID को follow करें 👆🏻

No comments:

Post a Comment

Omkareshwar Madhya Paradesh India

Omkareshwar, located on the Narmada River in Madhya Pradesh, is a sacred pilgrimage site and home to one of the 12 Jyotir...