Friday, November 15, 2024
Historical story
Rani Lakshmibai, popularly known as the Rani of Jhansi, was a prominent leader of the Indian Rebellion of 1857 and one of the most inspiring figures in Indian history. Born on 19 November 1828 in Varanasi, she was named Manikarnika Tambe and was affectionately called "Manu" in her childhood.
Key Highlights of Her Life:
1. Marriage and Role as Queen:
She married Maharaja Gangadhar Rao Newalkar, the ruler of Jhansi, in 1842 and became the Rani of Jhansi. After the death of their son, they adopted a child, Damodar Rao. However, the British East India Company refused to recognize the adoption and attempted to annex Jhansi under the Doctrine of Lapse.
2. Role in the 1857 Revolt:
When the rebellion against British rule broke out, Rani Lakshmibai emerged as a key leader. She famously declared, "Main apni Jhansi nahi doongi" (I will not give up my Jhansi).
She organized her army, including women soldiers, and fiercely defended Jhansi against the British forces.
After Jhansi fell, she joined other rebel leaders like Tatya Tope and Rao Sahib, continuing her fight against the British.
3. Battle and Martyrdom:
In 1858, during the Battle of Gwalior, she fought bravely against the British forces but was fatally wounded. She died on 18 June 1858, at the age of 29, becoming a symbol of resistance and bravery.
Legacy:
Rani Lakshmibai is celebrated as a national heroine and a symbol of India's fight for freedom. Her courage and determination continue to inspire generations. She has been immortalized in poems, books, and films, with the most famous poem being "Khoob Ladi Mardani, Woh Toh Jhansi Wali Rani Thi" by Subhadra Kumari Chauhan.
Her life is a testament to her patriotism, leadership, and indomitable spirit.
Thursday, November 14, 2024
Historical Story
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की धर्मपत्नी राजमाता हेलेना के वंशज हल्दिया मौर्य लोग हल्दी की तरह गोरे रंग के कारण, हार्डिया, हल्दिया आदि कहे गए है। हेलेना के बेटे का नाम जस्टिन मौर्य था। जो एक विद्वान लेखक बना। जस्टिन मौर्य की संतानें मूल रूप से अधिक गोरी थी। लेकिन सभी मौर्य जाती और उपजातियों में अंतर्विवाह के कारण सब मौर्य घुल मिल गए।
जस्टिन बिन्दुसार से बड़े नहीं थे। वह हो ही नहीं सकता था। चन्द्रगुप्त की पहली पत्नी की मृत्यु बिन्दुसार को जन्म देते समय 320 ईसा पूर्व में हो गई थी। चंद्रगुप्त ने 15 साल बाद 305 ईसा पूर्व में हेलेन से शादी की और उनसे जस्टिन का जन्म हुआ। वह बिन्दुसार से कम से कम 20 वर्ष छोटा होना चाहिए।
हेलेना एक पतिव्रता और समझदार स्त्री थी। ऐसा कोई दृष्टांत नही मिलता की उसने मौर्य वंश के विरुद्ध किसी प्रकार का कोई राजनैतिक षड्यंत्र किया हो। वो दो महान सभ्यताओं को मिलाने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। उसके समय मे कई यूनानी भारत आये और यहीं पर बस गए। ऐसा ही एक ग्रीक था हेलियोडोरस जो मध्यप्रदेश के विदिशा में बस गया था और उसने एक स्तम्भ का निर्माण करवाया था जिसे उसी के नाम से जाना जाता है। आप कभी विदिशा जाएं तो जरूर देखें।
विश्व की सबसे बड़ी तोप, जो इतिहास में चली एक बार और बना दिया तालाब
एक ऐसी तोप जिसके बारे में सुनते ही दुश्मन कांप जाते थे। इस तोप के लिए 1720 में जयपुर स्थित आमेर के पास जयगढ़ किले में विशेष कारखाना स्थापित किया गया। परीक्षण के लिए जब इससे गोला दागा गया, तो वह 30 किलोमीटर दूर 'चाकसू' नामक कस्बे में जाकर गिरा। जहां गिरा वहां एक तालाब बन गया। अब तक उसमें पानी भरा है और लोगों के काम आ रहा है। बस ये बात दूर-दूर तक फैल गई और दुश्मन इस तोप से डरने लगे। किले के नाम के आधार पर ही इस तोप का नामकरण किया गया।
आमेर महल के पास स्थित जयगढ़ के किले में यह तोप स्थित है। इसे 'एशिया की सबसे बड़ी तोप' के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपनी रियासत की सुरक्षा और उसके विस्तार के लिए कई कदम उठाए। जयगढ़ का किला और वहां स्थापित जयबाण तोप उनकी इस रणनीति का हिस्सा थी।
इस तोप का निर्माण 1720 के आसपास कराया गया था। अरावली की पहाड़ी पर स्थित जयगढ़ किले के डूंगरी दरवाजे पर स्थित जयबाण तोप के बारे में माना जाता है कि यह एशिया की सबसे बड़ी और वजनदार तोप है। इस तोप की नली से लेकर अंतिम छोर की लंबाई 31 फीट 3 इंच है। तोप की नली का व्यास क़रीब 11 इंच है। इसका वजन 50 टन से अधिक होने का अनुमान है।
जयबाण तोप का इस्तेमाल आज तक किसी युद्ध में नहीं हुआ और न ही इसे कभी यहां से हिलाया गया। परीक्षण के लिए इस तोप का गोला तैयार करने में 100 किलो गन पाउडर यानी बारूद की जरूरत पड़ी थी।
इस तोप को बनाने के लिए जयगढ़ में ही कारखाना बनाया गया। इसकी नाल भी यहीं पर विशेष तौर से बनाए सांचे में ढाली गई थी। लोहे को गलाने के लिए भट्टी भी यहां बनाई गई। इसके प्रमाण जयगढ़ किले में आज भी मौजूद है। इस कारखाने में और भी तोपों का निर्माण हुआ। विजयदशमी के दिन इस तोप की विशेष पूजा की जाती है। ऐसी ओर भी जानकारी पाने के लिए ID को follow करें 👆🏻
Historical
मर सकता हूँ मगर झुकना नहीं है मंज़ूर मुझे,
हाँ मैं ‘क्षत्रिय ’ हूँ, इस बात का है ग़ुरूर मुझे,
दंभ है पश्चिम तुझे, चुटकी में तोड़ देंगे हम,
हुंकार भर जो उठ गए, घमंड तेरा चूर है,
सांसों में मेरी संस्कृति है, वेद बहते ख़ून में,
पुराण-शास्त्र-उपनिषद, चेहरे का मेरे नूर है,
शत्रु
जो शत्रु की छाती चीरे धार अभी वो बाकि है,
सर काटे जो शत्रु का, तलवार अभी वो बाकि है,
कायरता न समझे गीदड़, हम शेरों की ख़ामोशी को,
जो पंजे से शत्रु के पेट को चीरे बघनख अभी वो बाकि है.!!!!
क्षत्रिय धर्म युगे: युगे: ⚔️🚩
#राजपुत्र #राजन्य #राजपूताना #राजपूती #ठाकुर #राजपूत #राजपुताना #क्षत्रिय #सूर्यवंशी #चंद्रवंशी
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जय माॅं भवानी ⚔️🚩
जय एकलिंग महाराज ⚔️🚩
Wednesday, November 13, 2024
Historical
दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु दौड़ते हुए घोड़े से गिरने के कारण हुई थी।
लेकिन क्या यह सच में संभव है कि एक सेनापति जिसने 11 साल की उम्र में पहली बार घोड़े की सवारी की और अनगिनत लड़ाइयाँ घोड़ों पर सवार होकर लड़ी, वह दौड़ते हुए घोड़े से गिरकर मर सकता है?
असली इतिहास बनाम झूठी मनगढ़ंत कहानी
जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना को लूटा, तो उसने मेवाड़ के राजा को मार डाला और राजकुमार करण सिंह को बंदी बना लिया। लूटी गई संपत्ति और राजकुमार के साथ, वह राजकुमार के घोड़े "..शुभ्रक.." को भी लाहौर ले गया।
लाहौर में करण सिंह ने भागने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में पकड़ा गया। कुतुबुद्दीन ने उसका सिर काटने का आदेश दिया और अपमान को बढ़ाने के लिए मृत राजकुमार के सिर को गेंद की तरह इस्तेमाल करते हुए पोलो मैच खेलने का आदेश दिया।
सिर काटने वाले दिन कुतुबुद्दीन शुभ्रक पर सवार होकर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा। अपने स्वामी करण सिंह को देखते ही घोड़ा बेकाबू होकर उछलने लगा, जिससे कुतुबुद्दीन घोड़े से गिर पड़ा और शुभ्रक ने गिरे हुए कुतुबुद्दीन को जोरदार लात मारी। छाती और सिर पर घातक खुरों से किए गए शक्तिशाली प्रहार घातक साबित हुए। कुतुबुद्दीन ऐबक की मौके पर ही मौत हो गई।
सभी लोग स्तब्ध रह गए। शुभ्रक करण सिंह की ओर भागा और उसके बाद मची अफरा-तफरी का फायदा उठाते हुए राजकुमार कूद पड़ा और अपने वीर घोड़े पर सवार हो गया, जिसने तुरंत ही दौड़ना शुरू कर दिया और अपने जीवन की सबसे कठिन दौड़ शुरू कर दी।
यह लगभग 3 दिनों तक लगातार चलने वाली दौड़ थी, जो अंत में मेवाड़ राज्य के द्वार पर जाकर रुकी। जब राजकुमार काठी से उतरा, तो शुभ्रक मूर्ति की तरह स्थिर खड़ा था। करण सिंह ने प्यार से घोड़े के सिर पर हाथ फेरा, लेकिन जब शुभ्रक जमीन पर गिरा, तो वह चौंक गया।
शक्तिशाली घोड़ा अपने मालिक को बचाने में सफल रहा और मरने से पहले उसे सुरक्षित उसके राज्य तक पहुँचाया। हमने चेतक के बारे में पढ़ा है, लेकिन शुभ्रक की कहानी वफ़ादारी से परे है! इस तरह के तथ्य हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली में कभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनते। हममें से ज़्यादातर लोगों ने यह नाम भी नहीं सुना है। यह इतिहास में दफन हो चुका है.
Historical
भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले भंगी का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे। जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये भंगी बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ? तब भगत सिंह कहता, मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस भले पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।
यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता।
भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, "बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ।" पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, "भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।"
सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा," बेबे अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!"
बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आज़म के लिए रोटियां बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई। भगत सिह के मुंह में रोटी का गराई डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी। "ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया।" भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाहों में भर लिया।
ऐसी सोच के मालिक थे अपने वीर सरदार भगत सिंह जी...। परन्तु आजादी के 76 साल बाद भी हम समाज में व्याप्त ऊँच-नीच के भेद-भाव की भावना को दूर करने के लिये वो न कर पाए जो 88 साल पहले भगत सिंह ने किया।
महान शहीदे आज़म को इस देश का सलाम।
Historical
*सिकंदर को हराने वाली कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका*
राजकुमारी कार्विका सिंधु नदी के उत्तर में कठगणराज्य की राजकुमारी थी। राजकुमारी कार्विका बहुत ही कुशल योद्धा थी। रणनीति और दुश्मनों के युद्ध चक्रव्यूह को तोड़ने में पारंगत थी। राजकुमारी कार्विका ने अपने बचपन की सहेलियों के साथ फ़ौज बनाई थी।
जिस उम्र में लड़कियाँ गुड्डे गुड्डी का शादी रचना खेल खेलते थे उस उम्र में कार्विका को शत्रु सेना का दमन कर के देश को मुक्त करवाना, शिकार करना इत्यादि ऐसे खेल खेलना पसंद थे। राजकुमारी धनुर्विद्या के सारे कलाओं में निपुण थी, दोनो हाथो से तलवारबाजी करते मां कालीका प्रतीत होती थीं।
कुछ साल बाद जब भयंकर तबाही मचाते हुए सिकंदर की सेना नारियों के साथ दुष्कर्म करते हुए हर राज्य को लूटते हुए कठगणराज्य की ओर आगे बढ़ रही थी, तब अपनी महिला सेना जिसका नाम राजकुमारी कार्विका ने चंडी सेना रखी थी जो कि 8000 से 8500 विदुषी नारियों की सेना थी, के साथ युद्ध करने का ठाना।
325 (इ.पूर्व) में सिकन्दर के अचानक आक्रमण से राज्य को थोडा बहुत नुक्सान हुआ पर राजकुमारी कार्विका पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर से युद्ध किया था। सिकन्दर की सेना लगभग 1,50,000 थी और कठगणराज्य की महज आठ हज़ार वीरांगनाओं की सेना थी जिसमें कोई पुरुष नहीं जो कि ऐतिहासिक है।
सिकंदर ने पहले सोचा "सिर्फ नारी की फ़ौज है, मुट्ठीभर सैनिक काफी होंगे” पहले 25000 की सेना का दस्ता भेजा गया उनमे से एक भी ज़िन्दा वापस नहीं आ पाया। राजकुमारी की सेना में 50 से भी कम वीरांगनाएँ घायल हुई थी पर मृत्यु किसी को छु भी नहीं पायी थी।
दूसरी युद्धनीति के अनुसार सिकंदर ने 40,000 का दूसरा दस्ता भेजा उत्तर पूरब पश्चिम तीनों और से घेराबन्दी बना दिया परंतु राजकुमारी सिकंदर जैसे कायर नहीं थी खुद सैन्यसंचालन कर रही थी उनके निर्देशानुसार सेना ने तीन भागो में बंट कर लड़ाई किया और सिकंदर की सेना पस्त हो गई।
तीसरी और अंतिम 85,000 दस्ताँ का मोर्चा लिए खुद सिकंदर आया। नंगी तलवार लिये राजकुमारी कार्विका ने अपनी सेना के साथ सिकंदर को अपनी सेना लेकर सिंध के पार भागने पर मजबूर कर दिया। इतनी भयंकर तबाही से पूरी तरह से डर कर सैन्य के साथ पीछे हटने पर सिकंदर मजबूर हो गया।
सिकंदर की 1,50,000 की सेना में से 25,000 के लगभग सेना शेष बची थी, हार मान कर प्राणों की भीख मांग लिया सिकंदर ने और कठगणराज्य में दोबारा आक्रमण नहीं करने का लिखित संधी पत्र दिया राजकुमारी कार्विका को।
इस महाप्रलयंकारी अंतिम युद्ध में कठगणराज्य के 8,500 में से 2,750 साहसी वीरांगनाओं ने भारत माता को अपना रक्ताभिषेक चढ़ा कर वीरगति को प्राप्त कर लिया। जिसमे से इतिहास के दस्ताबेजों में गरिण्या, मृदुला, सौरायमिनि, जया यह कुछ नाम मिलते हैं।
नमन है ऐसी वीरांगनाओं को
Monday, November 11, 2024
Historical Story
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इन दो द्वारों के बीच में जो शेड दिखाई दे रहे हैं, यह वही स्थान है जहां वीर कल्लाजी राठौड़ ने 60 वर्षीय जयमल जी को अपने कंधों पर बिठाकर अकबर के विरुद्ध युद्ध लड़ते हुए वीरगति पाई थी
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Omkareshwar Madhya Paradesh India
Omkareshwar, located on the Narmada River in Madhya Pradesh, is a sacred pilgrimage site and home to one of the 12 Jyotir...








